इंसान क्या चाहता है और उसे पाने के लिए जो करना है उसके लिए कितनी हिम्मत रखता है उसी से फैसला होता है कि उसे जो चाहिए वह मिलेगा या नहीं। कितनी बार मन करता है कि बस अब घर पर रहें, काम पर न जाएँ, लेकिन मजबूर हो कर जाना ही पड़ता है। सोचना पड़ता है कि क्या यही चाहते थे हम, या कुछ और? पैसा, शोहरत, या चैन की साँस? उन दिनों तो लगता ही नहीं कि पैसा और शोहरत पाने के लिए चैन की साँस खोनी पड़ेगी। लेकिन खोनी पड़ती है और उसके बाद भी चढ़ाई बस चढ़ते जाओ, चढ़ते जाओ, कभी खतम नहीं होती। कहीं रुक गए तो डर लगता है कि दूसरे आगे निकल जाएँगे। जीत तो सकते ही नहीं।
चाहत खत्म क्यों नहीं होती? साइकिल मिल गई तो कार चाहिए, एक कार मिल गई तो दो, कभी भी खत्म नहीं होती।
भारत में मधुमेह - कितना प्यारा नाम है, पर जानलेवा - बढ़ रहा है, और बहुत तेजी से। चिंता होती है कि मेरी भी हालत वैसी ही तो नहीं हो जाएगी जैसी मेरे परिवार के और बुजुर्गों की हुई है। उम्मीद करता हूँ कि कुछ समय निकाल पाऊँगा, कसरत करने के लिए। बीमारी की सबसे बुरी चीज है बेसहारापन की भावना, जो इंसान को नपुंसक और जोशहीन बना के ही छोड़ती है।
अक्सर लोग अच्छा काम नहीं कर पाते क्योंकि कोई बताने वाला नहीं होता है कि क्या करें।
Friday, October 06, 2006
हिम्मत और चाहत
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3 comments:
हिन्दी-चिट्ठाकारी में आपका स्वागत है। आपके ब्लॉग की सूचना 'हिन्द-युग्म' पर दी जा रही है। लिखना चालू रखिए।
आ गया पटाखा हिन्दी का
अब देख धमाका हिन्दी का
दुनिया में कहीं भी रहनेवाला
खुद को भारतीय कहने वाला
ये हिन्दी है अपनी भाषा
जान है अपनी ना कोई तमाशा
जाओ जहाँ भी साथ ले जाओ
है यही गुजारिश है यही आशा ।
NishikantWorld
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